Monday, December 09, 2013

Rishtey


पतझड़ शुरू हुए नहीं, पत्ते बिखर गए! 
नींद खुली नहीं, सपने बेह गए!
धागा सोंच के बनाये थे हमने रिश्ते 
किस्से थी झनक, वेह मांझा थे?
छोटी सी एक भूल हुई नहीं, उंगली कट गई!

देखा है हमने पटरियों को मिल के बिछड़ते,
उलझ गए हम कब  इतना, कि चाह के भी सुलझ न पाये?

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